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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
यदा विराटः परवीरघाती; मर्मान्तरे शत्रुचमूं प्रवेष्टा |  ३३   क
मत्स्यैः सार्धमनृशंसरूपै; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति