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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
तत्रालसा मनुष्याणां ये भवन्त्यमनस्विनः |  १२   क
उत्थानं ते विगर्हन्ति प्राज्ञानां तन्न रोचते ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति