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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
शक्नोति जीवितुं दक्षो नालसः सुखमेधते |  १५   क
दृश्यन्ते जीवलोकेऽस्मिन्दक्षाः प्राय़ो हितैषिणः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति