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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
यदि दक्षः समारम्भात्कर्मणां नाश्नुते फलम् |  १६   क
नास्य वाच्यं भवेत्किञ्चित्तत्त्वं चाप्यधिगच्छति ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति