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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति विष्टितः |  १७   क
स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्यो भवति प्राय़शः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति