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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
आवद्धा मानुषाः सर्वे निर्वन्धाः कर्मणोर्द्वय़ोः |  २   क
दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति