सौप्तिक पर्व  अध्याय २

कृप उवाच

दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान्सम्यगीहते |  २०   क
दक्षो दाक्षिण्यसम्पन्नो न स मोघं विहन्यते ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति