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द्रोण पर्व
अध्याय ७३
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सञ्जय़ उवाच
निमेषान्तरमात्रेण भारद्वाजोऽपरं धनुः |  ३४   क
सज्यं चकार तच्चाशु चिच्छेदास्य स सात्यकिः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति