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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतः समुद्विग्नो नराधिप |  २०   क
अभेद्यकवचं मत्वा कर्णमद्भुतविक्रमम् |  २०   ख
अनुस्मरंश्च सङ्क्लेशान्न शान्तिमुपय़ाति सः ||  २०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति