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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
पर्जन्यः पर्वते वर्षन्किं नु साधय़ते फलम् |  ५   क
कृष्टे क्षेत्रे तथावर्षन्किं नु साधय़ते फलम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति