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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
रथाक्षमात्रैरिषुभिरभ्यवर्षद्घटोत्कचः |  ६५   क
रथिनामृषभं कर्णं धाराभिरिव तोय़दः |  ६५   ख
शरवृष्टिं च तां कर्णो दूरप्राप्तामशातय़त् ||  ६५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति