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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसं शङ्कमानस्तु विकृष्य वलवद्धनुः |  १६   क
अभ्यधावत काकुत्स्थस्ततस्तं सहलक्ष्मणः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति