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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तोऽङ्गिरसां श्रेष्ठमामन्त्र्य प्रतिपूज्य च |  १४   क
जगाम सहसा रामं महेन्द्रं पर्वतं प्रति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति