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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु राममुपागम्य शिरसाभिप्रणम्य च |  १५   क
व्राह्मणो भार्गवोऽस्मीति गौरवेणाभ्यगच्छत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति