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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
रामस्तं प्रतिजग्राह पृष्ट्वा गोत्रादि सर्वशः |  १६   क
उष्यतां स्वागतं चेति प्रीतिमांश्चाभवद्भृशम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति