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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
स कदाचित्समुद्रान्ते विचरन्नाश्रमान्तिके |  १९   क
एकः खड्गधनुष्पाणिः परिचक्राम सूतजः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति