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वन पर्व
अध्याय २५८
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मार्कण्डेय़ उवाच
आश्रमाद्राक्षसेन्द्रेण रावणेन विहाय़सा |  २   क
माय़ामास्थाय़ तरसा हत्वा गृध्रं जटाय़ुषम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति