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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
येन विस्पर्धसे नित्यं यदर्थं घटसेऽनिशम् |  २४   क
युध्यतस्तेन ते पाप भूमिश्चक्रं ग्रसिष्यति ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति