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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
यथेय़ं गौर्हता मूढ प्रमत्तेन त्वय़ा मम |  २६   क
प्रमत्तस्यैवमेवान्यः शिरस्ते पातय़िष्यति ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति