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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रसादय़ामास पुनस्तं द्विजसत्तमम् |  २७   क
गोभिर्धनैश्च रत्नैश्च स चैनं पुनरव्रवीत् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति