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शान्ति पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
नेदं मद्व्याहृतं कुर्यात्सर्वलोकोऽपि वै मृषा |  २८   क
गच्छ वा तिष्ठ वा यद्वा कार्यं ते तत्समाचर ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति