अनुशासन पर्व  अध्याय २

युधिष्ठिर उवाच

भूय़स्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मार्थसहितं नृप |  २   क
कथ्यमानं त्वय़ा किञ्चित्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति