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सभा पर्व
अध्याय ६३
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कर्ण उवाच
प्रय़ोजनं चात्मनि किं नु मन्यते; पराक्रमं पौरुषं चेह पार्थः |  ५   क
पाञ्चाल्यस्य द्रुपदस्यात्मजामिमां; सभामध्ये योऽतिदेवीद्ग्लहेषु ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति