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सभा पर्व
अध्याय ४५
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दुर्योधन उवाच
शैक्यं रुक्मसहस्रस्य वहुरत्नविभूषितम् |  २७   क
दृष्ट्वा च मम तत्सर्वं ज्वररूपमिवाभवत् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति