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सभा पर्व
अध्याय १३
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श्रीकृष्ण उवाच
इत्येषा मे मती राजन्यथा वा मन्यसेऽनघ |  ६८   क
एवं गते ममाचक्ष्व स्वय़ं निश्चित्य हेतुभिः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति