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कर्ण पर्व
अध्याय ३५
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सञ्जय़ उवाच
ते सेने भृशसंविग्ने दृष्ट्वान्योन्यं महारणे |  ५०   क
हर्षेण महता युक्ते परिगृह्य परस्परम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति