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अनुशासन पर्व
अध्याय २
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भीष्म उवाच
सुरतं तेऽस्तु विप्राग्र्य प्रीतिर्हि परमा मम |  ६८   क
गृहस्थस्य हि धर्मोऽग्र्यः सम्प्राप्तातिथिपूजनम् ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति