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अनुशासन पर्व
अध्याय २
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भीष्म उवाच
नित्यमेते हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिताः |  ७३   क
सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म धर्मभृतां वर ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति