आश्वमेधिक पर्व  अध्याय २

वैशम्पाय़न उवाच

गोविन्द मय़ि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम |  १०   क
सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मामनुकम्पसे ||  १०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति