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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अकृता ते मतिस्तात पुनर्वाल्येन मुह्यसे |  १५   क
किमाकाशे वय़ं सर्वे प्रलपाम मुहुर्मुहुः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति