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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्वहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः |  ३   क
देवांस्तर्पय़ सोमेन स्वधय़ा च पितॄनपि ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति