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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं हि यशसा क्षत्रं स्वर्गं प्राप्तुमसंशय़म् |  ७   क
न हि कश्चन शूराणां निहतोऽत्र पराङ्मुखः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति