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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रश्च तान्वीरान्विनीतान्विनय़े स्थितान् |  ११   क
शिष्यवृत्तौ स्थितान्नित्यं गुरुवत्पर्यपश्यत ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति