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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा चैव भवद्भिश्च मान्य एष नराधिपः |  ४   क
निदेशे धृतराष्ट्रस्य यः स्थास्यति स मे सुहृत् |  ४   ख
विपरीतश्च मे शत्रुर्निरस्यश्च भवेन्नरः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति