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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु राजा वृद्धः सन्पुत्रशोकसमाहतः |  ८   क
शोकमस्मत्कृतं प्राप्य न म्रिय़ेतेति चिन्त्यते ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति