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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
यावद्धि कुरुमुख्यस्य जीवत्पुत्रस्य वै सुखम् |  ९   क
वभूव तदवाप्नोतु भोगांश्चेति व्यवस्थिताः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति