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मौसल पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्यव्रुवन्त ते राजन्प्रलव्धास्तैर्दुरात्मभिः |  ११   क
मुनय़ः क्रोधरक्ताक्षाः समीक्ष्याथ परस्परम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति