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मौसल पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रविवेश पुनर्गृहान् |  १४   क
कृतान्तमन्यथा नैच्छत्कर्तुं स जगतः प्रभुः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति