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सभा पर्व
अध्याय १७
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कृष्ण उवाच
सर्वमूर्धाभिषिक्तानामेष मूर्ध्नि ज्वलिष्यति |  १४   क
सर्वेषां निष्प्रभकरो ज्योतिषामिव भास्करः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति