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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वान्तर्हितो दिव्यः पुरुषः स महाप्रभः |  ४३   क
विस्मय़ं जग्मतुश्चोभौ तौ वीरौ रामलक्ष्मणौ ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति