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सभा पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
शर्मकान्वर्मकांश्चैव सान्त्वेनैवाजय़त्प्रभुः |  १२   क
वैदेहकं च राजानं जनकं जगतीपतिम् |  १२   ख
विजिग्ये पुरुषव्याघ्रो नातितीव्रेण कर्मणा ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति