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उद्योग पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
विदितं ते महावाहो धर्मज्ञ मधुसूदन |  ४   क
यथा निकृतिमास्थाय़ भ्रंशिताः पाण्डवाः सुखात् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति