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विराट पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वमर्थमभिसन्धाय़ तस्यार्थमनुचिन्त्य च |  ४   क
उद्वेगं चैव कृष्णाय़ाः सुदेष्णा सूतमव्रवीत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति