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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
स संनिवृत्तो धर्मात्मा दुःखशोकसमन्वितः |  ३१   क
शुश्राव तत्र वदतां दीना वाचः समन्ततः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति