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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम् |  ३   क
चक्रप्रभृतिभिर्घोरैर्दिव्यैः पुरुषविग्रहैः |  ३   ख
उपास्यमानं वीरेण फल्गुनेन सुवर्चसा ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति