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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
स ता गिरः पुरस्ताद्वै श्रुतपूर्वाः पुनः पुनः |  ३८   क
ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानत पाण्डवः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति