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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
किं नु तत्कलुषं कर्म कृतमेभिर्महात्मभिः |  ४३   क
कर्णेन द्रौपदेय़ैर्वा पाञ्चाल्या वा सुमध्यया ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति