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सभा पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः |  १४   क
अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम् |  १४   ख
अभीषून्सम्प्रजग्राह स्वय़ं कुरुपतिस्तदा ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति