सभा पर्व  अध्याय २

वैशम्पाय़न उवाच

लोचनैरनुजग्मुस्ते तमा दृष्टिपथात्तदा |  २१   क
मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वय़ात् ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति