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सभा पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
अकामा इव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः |  २३   क
निवृत्योपय़युः सर्वे स्वपुरं पुरुषर्षभाः |  २३   ख
स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि समय़े द्वारकामगात् ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति